जीवन में वक़्त, लोग और परिस्थितियाँ— सब कुछ बदल जाता है। लेकिन कुछ एहसास ऐसे होते हैं जिन पर समय की धूल कभी नहीं जमती। यह रचना उन अधूरे खतों, खामोश शामों और दिल के किसी कोने में महकते उस अहसास के नाम है, जो कभी ख़त्म नहीं होता…
#प्याररहजाता_है
प्यार रह जाता है— शिकवे-शिकायतों में या फिर इंतज़ार में, कभी पुराने खतों की परतों में, तो कभी किसी खामोश ढलती शाम की हवा में।
कभी क्षिप्रा नदी के तट पर उस अकेले खड़े आम के पेड़ के नीचे। तो कभी रेल ब्रिज पर साथ चलते हुए बिताए उन लम्हों के पास। कभी वह रह जाता है मान-अभिमान के संदूक में, तो कभी सूखे हुए गुलाब की पंखुड़ियों में।
प्यार रह जाता है न मिल पाने वाले उन पलों में। तो कभी प्यार रह जाता है झमाझम बरसती बारिश में एक ही छतरी के नीचे। प्यार रह जाता है आँखों के इशारों में। एक ही थाली का खाना बांटकर खाने वाले सुकून के घर में।
हर प्यार का अंत मिलन से नहीं होता, कुछ प्यार खोकर भी अजीब तरीके से जिंदा रहते हैं। जैसे सूखी हुई नदी के सीने में पानी की यादें रह जाती हैं, वैसे ही इंसान के भीतर रह जाते हैं कुछ नाम, कुछ चेहरे और कुछ अधूरी बातें।
जिसे पाया नहीं जा सका, वही शायद दिल में सबसे ज़्यादा जगह घेर कर बैठ जाता है। क्योंकि पा लेना एक दिन आदत बन जाता है, लेकिन अधूरापन ताउम्र कविता बनकर रहता है।
रात गहरी होने पर जो नाम अचानक याद आता है, जो चेहरा बेवजह खिड़की के कांच पर उभर आता है, वही तो प्यार है— जो दूर जाकर भी पूरी तरह दूर नहीं जा पाता।
प्यार रह जाता है अफ़सोस की आहों में, इंतज़ार के खामोश पहरों में, या फिर किसी बारिश से भीगी दुपहरी में अचानक सीने में उठने वाले दर्द में।
वक़्त बहुत कुछ छीन लेता है, लेकिन सच्चा प्यार वक़्त से कभी नहीं हारता। वह रह जाता है— कभी याद बनकर, कभी खामोशी बनकर, तो कभी आँखों का एक आंसू बनकर।
और तब महसूस होता है कि प्यार इंसान को छोड़कर नहीं जाता, इंसान ही बस दूर चला जाता है। प्यार रह जाता है— शिकवे-शिकायतों में, या फिर इंतज़ार में।
फिल्म “रोज़ा” के उस मशहूर गीत की एक पंक्ति यहाँ बरबस याद आती है— ‘तुम्हारी और मेरी मौत होती है, लेकिन प्यार की कोई मौत नहीं होती, कोई अंत नहीं होता…’
पाठकों के लिए: क्या आपके दिल के किसी कोने में भी कोई ऐसा नाम, कोई चेहरा या कोई अधूरी बात बची रह गई है, जो वक़्त के साथ और गहरी हो गई? अपने अहसास नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
-सुजाता चक्रवर्ती
