भाव कुण्डली बेरंग पड़ी है शिकायत है नजारों से,
नजर में करूणा नही, पतझड़ की झलक बहारों में।
हाय हाय किच किच में मिलना बिछुड़ना जारी है,
हर कोई अन्दर से टूटा है, और टूट रहे परिवारों में।।
इँसान अब बदल रहा, श्वेतपोश हैवानों में,
रूह दुःख-दर्द झेल रही, मन फँसा व्यवधानों में।
जिन्दगी पलपल जी रही, वक्त की निगरानी में,
वक्त भी अब बेचैन है, रँग बदलते इँसानों से।।
जीवन की पिचकारी में, अब रँग नही जज्बातों के।
कर्मठता का भान नही है, रूठे भाग्य सौगातों के।
दु:ख दर्द के तुफानों में जिन्दगी सिमट के भटक रही,
कुछ पाया कुछ खोया अब खेल कहाँ उत्पातो के।।
-नूतन “प्रयाग रजनी”
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
