डॉ. बशीर बद्र जी को भावभीनी श्रद्धांजलि

आज साहित्य और ग़ज़ल की दुनिया का एक संवेदनशील स्वर मौन हो गया।
बशीर बद्र केवल एक शायर नहीं थे, वे टूटते रिश्तों, बिखरती संवेदनाओं और इंसानी भावनाओं के सबसे सच्चे दस्तावेज़ थे। उनकी ग़ज़लों ने न जाने कितने दिलों को सुकून दिया, कितने अकेले मनों को आवाज़ दी।
उनकी लिखी पंक्तियाँ आज भी जीवन की सच्चाइयों को बेहद सहजता से हमारे सामने रख देती हैं,..
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”

यह केवल एक शेर नहीं, बल्कि समाज और इंसानियत के प्रति उनकी गहरी संवेदना का प्रमाण है।

इसी तरह
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।”

उनकी लेखनी में प्रेम भी था, पीड़ा भी, अपनापन भी और समय की विडंबनाओं पर गहरी दृष्टि भी।
उन्होंने शब्दों को केवल लिखा नहीं, उन्हें जिया। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें हर पीढ़ी के दिल में अपनी जगह बना लेती हैं।
आज उनका जाना केवल एक साहित्यकार का जाना नहीं, बल्कि उर्दू अदब की एक पूरी तहज़ीब का मौन हो जाना है।
वे अपनी रचनाओं, अपने विचारों और अपनी अमर पंक्तियों के माध्यम से सदैव हमारे बीच जीवित रहेंगे।
अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि

डॉ. प्रीति समकित सुराना
संस्थापक
अन्तरा शब्दशक्ति प्रकाशन एवं संस्था

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