तन्हाइयाँ

मेरे पीछे-पीछे दबे पाँव अचानक कोई
घर में घुसने की कोशिश में शायद अब
जोर से दरवाजे की साँकल खटका रहा है
समझ नहीं पाई वह कौन हो सकता है?

उफ, अब तो उठकर जाना ही होगा मुझे
दरवाजा भी खोलना पड़ेगा न चाहते हुए
चलो, चलकर देखते हैं कौन है वहाँ पर?
क्यों मुझे वह अधीरता से पुकार रहा है?

उसकी बैचेनी का आखिर कारण क्या है?
उठती हूँ, बाहर जाती हूँ उसे देखने हेतु
सोचती हूँ कौन-सा मेहमान आया है यहाँ
यह क्या? द्वार खोलते ही एक अजनबी।

मुझे एकटक निहारती हुई यह कौन है?
अपनी दोनों बाहें फैलाए सामने से आती
मेरी ओर खुले मन से बढ़ती यह कौन है?
मैंने घर के द्वार पर खड़े ही उससॆ पूछा।

कौन हो तुम? मैं नहीं पहचानती तुम्हें
बड़ी जोर से हँसकर बोली थी मुझसे
मैं तेरी सखी हूँ, भूल गई हो क्या मुझे?
मैं तो हर पल ही तेरे साथ थी पगली।

कुछ दिन तेरे घर में चहल-पहल देख
दूर चली गई थी घूमने-फिरने के लिए
परन्तु अब तो मैं तेरे पास लौट आई हूँ
तुझे थामने औ प्यार से बचाने के लिए।

मैंने फिर उससे तमतमा कर पूछ लिया
यह बता दो मुझे तुम आखिर हो कौन?
मुझसे लिपटकर बड़े प्यार से बोली वो
मैं तेरी सखी हूँ, तेरी तन्हाई हूँ बावली।

तुझ से दूर रहकर जी नहीं सकती थी
इसीलिए तेरे पास आई हूँ अरी सखी
किसी साथी के न होने का यह गम
नहीं सतायेगा तुझे अकेलापन उम्रभर।

मेरे साथ साँझे कर लो री सखी तुम
अपने सभी हसीन कमसिन से पल
सारी खुशी अपने सारे गम जानेमन
समेटकर अपने दिल में बसा ले मुझे।

तेरे आँगन में हरपल मैं इठलाऊँगी
घर में अन्दर-बाहर सदा-सर्वदा ही
चारों तरफ तुझे नजर आऊँगी सखी
प्रिये! अपना बना ले मुझे सोच मत।

अपनी यादों के झरोखों से तुम अब
मत निकालो मुझे घर से और दिल से
बहुत पछताओगी रोवोगी गिड़गिड़ोगी
अपने इस मन में बसा ले सदा के लिए।

उसका इतना कहना बहुत था मेरे लिए
उसे अपने मन में, अपने घर में बसाया
तो बसा ही लिया हमेशा-हमेशा के लिए
अब बस मैं हूँ और है मेरी मेरी तन्हाई।

-चन्द्र प्रभा सूद

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