तुम्हारी ग़ज़लें हँसा रही हैं, तुम्हारी ग़ज़लें रुला रही हैं
ज़माने से जो छिपानी थीं वो, तमाम बातें बता रही हैं
हमें समझ में नहीं हैं आतीं, तुम्हारी चाहत तुम्हारी बातें
कभी लगे ये बिगाड़ें हमको, कभी लगे ये बना रही हैं
मुहब्बतों की ये बंदिशें सब, कभी हैं साथी कभी हैं दुश्मन
हमीं से हमको जिता रही हैं, हमीं से हमको हरा रही हैं
कभी है महफ़िल कभी है ख़ल्वत, कभी है आँसू कभी हँसी है
मिली-जुली ये कमाई सारी, मुहब्बतों का सिला रही हैं
उन्हें ये डर है बिछड़ के उनसे, हम अपनी सुधबुध कहीं न खो दें
उन्हें बताओ कि यादें उनकी, सदा हमारी दवा रही हैं
तभी तो ग़ालिब मियाँ ये कहते, कि इश्क़ आसाँ नहीं है ‘बादल’
तमाम आँखें टिकी हैं हम पर, हँसी हमारी उड़ा रही हैं।
-मनीष बादल
भोपाल (मध्यप्रदेश)
