तुम ही भरोसा हो मेरा,तुम ही मेरी आस्था
तुम ही आसरा हे भगवन,तुम से ही वास्ता
और तो सारे यहां के, जिन्दगी के यार हैं
एक आप ही हे त्रिलोचन प्राण के आधार हैं
जीवन-मरण की इस बीच धारा में बहे जाना
ऐसे में हे प्रभु तुम्हें जब भी दूं आवाज चले आना।
जानती हूं तुम हमेशा हो सही देते हो अच्छा ही
लेते मगर हो अपने भक्तों की पग पग परीक्षा भी
हो जाऊं गर मैं पास तो बस तुम यूं ही मुस्काना
अज्ञानता में घिर जब भी दूं आवाज चले आना।
संसार सागर मोह-माया फिर भी जीना ही पड़ेगा
जब तक रहेगी सांस तन में खाना पीना भी पड़ेगा
मृगतृष्णा की धार जो बहने लगूं तो तुम ही बचाना
मझधार में फंस जब भी दूं आवाज चले आना।
-किरण मोर
कटनी
