जो बगल में बैठकर
चुपके से मेरे हाथ पर
तू अपना हाथ रख दे
कभी धीरे से आकर
मुझे अपनी ओर खींचकर
मेरा सर अपनी गोद में रख ले
तो बिन कहे ही जान ले
आंखों से सारी बात तू
न रोकूँ बहते आंसू मैं
लग जाऊँ तेरे सीने से
तू मेरे उलझे बालों को जो
धीरे-धीरे स्पर्श करे
तो धीरे -धीरे मेरे मन की ग्रंथियाँ भी
बिन कहे सुलझ जायें
मेरे सुख- दुख का
संचार हो जाये तुझ तक
मात्र स्पर्श की गर्माहट से
क्योंकि भावनाएं
शब्दों की मोहताज नहीं होतीं ॥
-ख़ुशी प्रयागराज
