पितृ दिवस पर : गीत श्रद्धांजलि…
ज़िन्दगी की हरेक राह पर, मोड़ पर,
थी पिता की सदा ही
कठिन भूमिका।
उंगलियाँ : आत्मबल की,
कथानक बनीं,
और कँधे : खुशी सौंप, घोड़ा बने।
बाल सहलाते हाथों में
थी बस दुआ—
पढ़-लिखें, पीठ पर सख्त कोड़ा बने।
कोरे मन पर लिखीं
बांसुरी की धुनें—
थी पिता की सदा ही
कठिन भूमिका।
हर कदम पर भरी
दृष्टि रामायणी,
अनुभवों में महाभारतों को भरा।
यों सजाया, सँवारा,
तराशा हमें—
बंजरों को रंगा खुशनुमा-सा हरा।
जो पिता ने रचीं
गीत की सुर-धुनें—
थी पिता की सदा ही
कठिन भूमिका।
खुद फटे चीथड़ों में
उमर काट दी,
हर हमें राजसी सँपदा सौंप दी।
एक माली ने यों कुछ
रचीं क्यारियाँ,
हर महक बाग की फूल में रौंप दी।
एक माली-सा गुलशन
सजाते हुए—
थी पिता की सदा ही
कठिन भूमिका।
-कृष्ण भारतीय
