शहर के उस आखिरी छोर पर, जहाँ कंक्रीट के जंगल की सांसें फूलने लगती हैं, वह ‘शांति विला’ खड़ा था। विला का नाम ‘शांति’ शायद इसलिए रखा गया था क्योंकि यहाँ का सन्नाटा कब्रिस्तानों को मात देता था। लोहे के विशाल फाटक पर जंग की ऐसी परतें थीं, जैसे वक्त ने खुद उसे छूना छोड़ दिया हो।
अनिरुद्ध ने अपनी महँगी चमड़े की जैकेट को झाड़ा। छह साल बाद ऑस्ट्रेलिया की चकाचौंध से वह इस धूल भरे सन्नाटे में लौटा था। टैक्सी ड्राइवर ने सामान उतारते हुए अजीब नज़रों से उसे देखा।
“साहब, इस घर में कोई रहता है क्या? बड़ी भारी महक आ रही है बाहर तक।”
अनिरुद्ध ने नाक सिकोड़ी। “मेरी माँ रहती हैं। बूढ़ी हैं, शायद सफाई नहीं करवा पातीं। तुम अपना किराया लो और निकलो।”
उसने जैसे ही धक्का दिया, दरवाज़ा बिना किसी आवाज़ के खुल गया। वह बंद नहीं था। उसे लगा था कि अंदर से मां की आवाज़ आएगी— “अरे अनु! तू आ गया?” पर अंदर से सिर्फ एक गाढ़ा, चिपचिपा अंधेरा बाहर आया। वह अंधेरा जो छह महीनों से इस विला की दीवारों के बीच पक रहा था।
ड्राइंग रूम की धूल पर उसके जूतों के निशान ऐसे बन रहे थे जैसे किसी पवित्र ग्रंथ पर कोई गाली लिख दी गई हो। उसने लाइट का स्विच दबाया, पर बिजली शायद बिल न भरने के कारण कट चुकी थी। अनिरुद्ध ने अपने आईफोन की फ्लैशलाइट जलाई। रोशनी की किरण उस सोफे पर पड़ी, जहाँ एक आकृति पसरी हुई थी।
“माँ? सो रही हो क्या? देखो, मैं सिडनी से सीधे आ रहा हूँ। बहुत थक गया हूँ, एक कप चाय तो पिला दो।”
बहुत दिनों बाद कमरे में कोई स्वर गूँज रहा था। सोफे पर जो था, वह अब माँ नहीं थी। वह हड्डियों का एक ढांचा था, जिस पर चमड़ी का बचा-कुचा भूरा लिबास लिपटा था। प्रकृति ने अपना काम बखूबी किया था— कीड़े अपना हिस्सा ले चुके थे, अब केवल अवशेष बचे थे। अनिरुद्ध की चीख गले में ही सूख गई। उसे लगा कि यह कोई प्रैंक है, पर वह गंध? वह गंध किसी मजाक की नहीं, बल्कि एक अंतिम सत्य की थी।
मेज पर एक कागज का टुकड़ा पड़ा था। धूल की परतों के नीचे दबे उस कागज पर कोई वसीयत नहीं थी, न ही गहनों का हिसाब। उस पर सिर्फ एक ही वाक्य हज़ारों बार लिखा गया था, जैसे कोई पागल मंत्र जपा गया हो— “बेटा, दरवाज़ा खुला है, तू बस आ जाना।”
अनिरुद्ध का हाथ कांपने लगा। उसने रोशनी कागज के निचले हिस्से पर डाली। वहाँ खून और आंसुओं के सूखे काले धब्बे थे, जहाँ लिखा था— “मैं मर नहीं रही अनु, बस सो रही हूँ ताकि जब तू आए तो मुझे जगा सके। ऑस्ट्रेलिया में बहुत ठंड होती है न? सुना है वहाँ लोग अपनों को भूल जाते हैं, पर तू तो मेरा बेटा है। स्वेटर पहन लेना, तुझे जुकाम जल्दी होता है।”
तभी अनिरुद्ध की नज़र उस कंकाल के सूखे, काले पड़ चुके हाथ की मुठी पर पड़ी। मुट्ठी कसी हुई थी। उसने हिम्मत जुटाकर उन ठंडी, पत्थर जैसी उंगलियों को खोला। अंदर एक छोटा सा, नीले रंग का ऊनी स्वेटर दबा था। वह आधा बुना हुआ था। एक सलाई अभी भी ऊन के गोलों में फंसी थी। यह स्वेटर अनिरुद्ध के उस बेटे के लिए था, जिसकी तस्वीर उसने तीन साल पहले व्हाट्सएप पर भेजी थी।
“माँ…” अनिरुद्ध के गले से एक घिघियाहट निकली।
वह ‘शांति विला’ अब एक कटघरा बन गया था। उसे याद आया, छह महीने पहले माँ का आखिरी फोन आया था। उसने झिड़क कर कह दिया था— “मम्मी, यहाँ प्रोजेक्ट की डेडलाइन है, आप रोज़ वही ‘कब आओगे’ का राग मत अलापा करो।”
-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनकी लेखनी का एक और सशक्त प्रमाण उनका व्यंग्य उपन्यास ‘यादों में गौरैया’ है, जिसने पाठकों के बीच अपार सफलता और लोकप्रियता हासिल की है। इस मार्मिक एवं तीक्ष्ण उपन्यास की सराहना सुप्रसिद्ध कवि डॉ. कुमार विश्वास ने भी की है, जो इसकी साहित्यिक गुणवत्ता और प्रभाव को और पुख्ता करता है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।
