किसने चाही ज़िम्मेदारी,
चाही सबने हिस्सेदारी।
लेन-देन पर टिकी हुई है,
दुनिया सारी है व्यापारी।
सींच रही हूँ अब तक मन में,
उसकी यादों की फुलवारी।
क्यों मैं शर्ते तेरी मानूँ,
मुझको प्यारी है ख़ुद्दारी।
भूख़ ग़रीबी मिट जाने के,
सारे वादे हैं सरकारी।
नन्ही चिड़िया के पर कतरे,
किसकी है ये कारगुज़ारी।
रश्मि टटोलें यादों के पल,
खोल ज़रा दिल की अलमारी।
-रश्मि ममगाईं
