☘️दीवारों को भी याद रहता है घर छोड़कर जाने वालों का स्पर्श
दीवारें केवल दीवारें नहीं होतीं…☘️
वे घर की सबसे मौन स्मृतियाँ होती हैं।
वे बोलती नहीं,
पर अपने भीतर
पूरा एक जीवन सँजोए रखती हैं।
उन्हें याद रहता है
किस बच्चे ने पहली बार लड़खड़ाते कदमों से
उनका सहारा लिया था,
किस माँ ने चुपके से
आँचल के कोने से आँसू पोंछे थे,
किस पिता ने आधी रात तक
चिंताओं को छिपाकर मुस्कुराने का अभिनय किया था…
उन्हें सब याद रहता है।
याद रहती हैं
सुबह की आरतियाँ,
रसोई से उठती रोटियों की महक,
बरसात की रातों में टपकती छत के नीचे
सिमटकर बैठा पूरा परिवार,
और याद रहती हैं वे हँसियाँ
जो अब वर्षों से उस घर में सुनाई नहीं दीं…
घर कभी एक दिन में सूना नहीं होता,
धीरे-धीरे खाली होता है।
पहले आँगन चुप होता है,
फिर चौखटें प्रतीक्षा करने लगती हैं,
फिर खिड़कियाँ रास्तों को ताकते-ताकते थक जाती हैं,
और अंत में…
दीवारें बोलना छोड़ देती हैं।
कितनी अजीब बात है
मनुष्य जहाँ वर्षों रहता है,
उसे छोड़ते समय
बस इतना कहता है
“अब यहाँ मन नहीं लगता…
पर वही घर
उसके जाने के बाद भी
उम्र भर उसी के लौटने का इंतज़ार करता है।
पुराने घरों में जाकर देखना कभी…
वहाँ सामान कम,
स्मृतियाँ अधिक मिलेंगी।
एक कोने में पड़ी टूटी चारपाई
अब भी किसी दादा की थकान समेटे होगी,
रसोई की बुझी आँच में
किसी माँ के अधूरे सपने राख बने पड़े होंगे,
और बंद कमरों में
कई अधूरी बातचीतें
आज भी हवा में भटकती होंगी…
कुछ दीवारों पर
समय धूल बनकर नहीं जमता,
वहाँ लोगों की अनुपस्थिति जमती है।
वहाँ कैलेंडर पुराने नहीं होते,
रिश्ते पुराने हो जाते हैं।
जिस घर में कभी
एक थाली कम पड़ जाती थी,
आज उसी घर में
बरसों तक चूल्हा नहीं जलता…
और सबसे अधिक दर्द तब होता है
जब बूढ़े माँ-बाप
उसी घर में अकेले रह जाते हैं
जिसे बनाने में उन्होंने
अपनी पूरी जवानी खर्च कर दी थी।
वे हर आहट पर चौंकते हैं,
हर त्योहार पर दरवाज़ा थोड़ा और खोल देते हैं,
हर फोन की घंटी में
बच्चों की आवाज़ ढूँढते हैं…
पर शहरों की भीड़ में खो चुके लोग
अब घर नहीं लौटते,
वे सिर्फ पैसे भेजते हैं।
दीवारें समझती हैं
कि रुपये कभी भी
कदमों की आहट नहीं बन सकते…
उन्हें आज भी याद है
वो अंतिम दिन
जब किसी ने जाते-जाते
एक बार मुड़कर घर को देखा था।
उस दिन से
घर वहीं खड़ा है…
उसी मोड़ पर…
उसी प्रतीक्षा में…
क्योंकि घरों को भरोसा होता है
कि जिन लोगों ने
उनकी दीवारों में अपना बचपन छोड़ा है,
वे एक दिन लौटेंगे ज़रूर।
लेकिन समय बहुत निर्दयी होता है…
वह लोगों को तो लौटा देता है,
पर वैसा नहीं लौटा पाता
जैसे वे कभी थे।
और तब…
पुरानी दीवारें
अपने झड़ते पलस्तर के साथ
धीरे से रोती हैं…
क्योंकि उन्हें भी याद रहता है
घर छोड़कर जाने वालों का स्पर्श…..
-निभा चौधरी
