अपने वायदों से मुकरते हुए देखे बहुत
बसे-बसाए घर उजड़ते हुए देखे बहुत।
काश! मेरा भी कोई सच्चा हमदर्द होता
बोल हमदर्दी के उगलते हुए देखे बहुत।
वक़्त पड़ने पर मदद को ना आया कोई
दम दोस्ती का पर भरते हुए देखे बहुत।
दफ़तर में मातहतों पर गांठते हैं खूब रोब
पर घर में चुहा बने दुबकते हुए देखे बहुत।
पब्लिक स्कूलों में पढ़े ही नहीं बनते अफ़सर
सरकारी स्कूल में पढ़े भी बनते हुए देखे बहुत।
ये भ्रम है कि प्रेम विवाह में प्यार ही है बरसता
छोटी बेकार बातों पर झगड़ते हुए देखे बहुत।
दहेज का दानव पड़ा अब भी पीछे हाथ धोकर
बहुओं को जलाने के केस बढ़ते हुए देखे बहुत।
अपनों की कामयाबी लोगों को सुहाती ही नहीं
ईर्षा और द्वेष की आग में जलते हुए देखे बहुत।
वक़्त कब किस करवट जाये बैठ न जाने कोई
हालात लोगों के बनते-बिगड़ते हुए देखे बहुत।
खून पसीना बहाके आलिशान कोठी थी बनाई
बुढ़ापा पर आश्रम में बसर करते हुए देखे बहुत।
-रामकिशन शर्मा
