देखो लहू के कतरे

(मनहरण घनाक्षरी काव्य)

देश फिर ना बिखरें,देखो लहू के कतरे।
जश्ने आजादी हमारी,भूल न जाना कभी।

छोड़ो धर्मों की लड़ाई,रूत बहारों की आई।
लहरा उठा तिरंगा,भूल न जाना कभी।

बीती कितनी सदियां,बहा लहू का दरिया।
चीखें शहिदों की यारों,भूल न जाना कभी।

रंग तिरंगे के देखो,दुर्जनों को तुम रोको।
एकता से जुड़े हम,भूल न जाना कभी।

बेलगाम हुई सत्ता,कैसे ये जहां देखता।
वीरों की है ये धरती,भूल न जाना कभी।

भाईचारा बना रहे,तिरंगा ये तुम्हें कहें।
संविधान शान मेरी,भूल न जाना कभी।

अब तो सुधर जाओ,फ़र्ज़ अपना निभाओ।
खिला हुआ है चमन,भूल न जाना कभी।

देश फिर ना बिखरें,देखो लहू के कतरे।
रहे क़ायम आज़ादी,भूल न जाना कभी – –

-प्रा.गायकवाड विलास
लातूर (महाराष्ट्र)

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