देख समय है क्रूर बड़ा ही निर्मम है –
बची ज़िन्दगी किसके साथ निभाओगे ।
रिश्ते – नाते तलवारें ले खड़े हुए ;
बच्चे हरक़त देख देखकर बडे हुए ;
समझदार वे लोग जो मिलकर रहते थे –
दीवारों पर महज़ फ्रेम में जडे हुए ;
वे लम्हे : जो प्रेम प्यार का उत्सव थे –
खत्म हुए अब क्या त्यौहार मनाओगे ।
घर में अब आता जाता मेहमान नहीं
आस पड़ोसी से अपनी पहचान नहीं
सन्नाटा है हमदर्दी की दुनियां में
खूब समझते हो इतने नादान नहीं
अगर मुसीबत पडी वक्त बेवक्त कभी
बोलो तो किसको आवाज लगाओगे
सबकी खुशियों में मुस्काना छोड दिया
सबके दुःख में आना-जाना छोड दिया
ऐसी आपाधापी में गुमनाम हुआ
मित्रों से भी हाथ मिलाना छोड दिया
शर्त लगा लो एकांकी हो दुनिया में
कभी सोचना जीभर कर पछताओगे
ऐसी कौन ख़ुशी है जिसका क़र्ज़ नहीं
चिंताओं में लिया कौन-सा मर्ज नहीं
अपने मतलब से मतलब रखता है तू
फिरभी कहता है तू तो खुदगर्ज नहीं
मरने के दिन कौन आयेगा मैय्यत में
अन्त घाट पर क्या पैदल ही जाओगे।
-कृष्ण भारतीय
