देर-सबेर

देर-सबेर ही सही,
समझ तो आया दुनिया का फंडा,
दिखावे हैं सारे रिश्ते नाते यहाँ,
कोई नहीं जग में अपना,
जो निभा सके निःस्वार्थ रिश्ते,
यहाँ तो जुड़े हैं सारे स्वार्थ से रिश्ते,
मतलबी हुआ है आज जमाना,
लगता है सारा जग बेगाना,
सीख लिया है अब रहना अकेले,
झूठ की चादर ओढ़े घूम रहे हैं अपने,
अब नहीं लगता किसी बात का डर,
लोगों की आदत है कहना,
हमने भी सीख लिया अब सुनना,
देर से ही जागे सही पर जाग गए,
झूठे रिश्तों में बंधे रहने से अच्छा है,
जितना निभे उतना निभाना,
बोझ तले जीने से बेहतर है,
ख़ुद को हल्का कर लेना!

-अदिति रूसिया
वारासिवनी

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