धैर्य का उत्कर्ष स्थापित करो जीवन के रण में
है बना कुरूक्षेत्र महाभारत निरूपित जन में गण में
शौर्य का कुंडल कवच क्यों कर्ण बनकर दान दें
नफरतों के तीर क्यों हम भाईयों पर तान दें
पार्थ का रथसारथी श्रीकृष्ण गीता ज्ञान दें
मृत्यु की शैय्या पे सबको भीष्म सा सम्मान दें
कितने अभिमन्यु जुटे हैं द्रौपदी के केश प्रण में
धैर्य का उत्कर्ष स्थापित करो जीवन के रण में
मौन है सारी धरा क्यों ये गगन चुपचाप है
मन के नीरव वन में देखो काल की पदचाप है
फूल कलियों का चमन बरबाद होता जा रहा है
वक़्त काँटों का हृदय में बीज बोता जा रहा है
क्यों बदलता जा रहा खुशियों का मौसम दुख के क्षण में
धैर्य का उत्कर्ष स्थापित करो जीवन के रण में
-दिनकर राव दिनकर
