बहारों को तुमने क्या रोका हुआ है
अचानक ये ख़ुशबू, कुछ धोखा हुआ है
ये बिखराए गेसू, घटा जैसे छाई
ज्यों बादल घुमड़ने का, धोखा हुआ है
यूँ शर्माए उपवन, कली मुस्कुराएं
इन गालों से जाने क्या धोखा हुआ है
वो बागों में रौनक, ज्यों चुपके से आई
तुम आए अचानक, कुछ धोखा हुआ है
लरज़ते लबों की, ज्यों लाली लिए तुम
गुलों के यूँ खिलने का धोखा हुआ है
वो बूंदें पसीने की माथे पर जैसे
न जाने क्यों शबनम का धोखा हुआ है
चमन को जरूरत नहीं और ‘नायक’
नहीं जानता मैं क्यों धोखा हुआ है!
-अरविन्द नायक
