“हास्य-व्यंग्य”
नई पड़ोसन बड़ी जोरदार,
किस्से उनके रहते मजेदार।
पुरानी हीरोइन की स्टाइल मारकर,
कपड़े पहनने में उन्हें मज़ा आता है।
साथ में स्टाइल मारकर डायलॉग सुनाकर,
दूसरों को हँसाना उन्हें भाता है।
अपने स्वास्थ्य के प्रति सजगता का,
उनका बड़ा नाता है।
हर माह के एक दिन पहुँचती,
अपने स्वास्थ्य की जाँच करवाने।
आज तो नीला ब्लाउज़, लाल साड़ी में,
मुमताज़ स्टाइल जूड़ा बाँध घर से निकलीं।
संयोग से मैं अपनी ज़रूरत के लिए,
उनके पहले ही डॉक्टर पास गई थी।
वो जैसे ही पहुँची डॉक्टर के यहाँ,
बिजली गोल हो जाने से।
उनके दिमाग का बल्ब तुरंत जल गया,
उन्होंने नई तरकीब निकाली।
टोकन लिया और फिर कुछ सोच,
डॉगी के गले के पट्टे में फँसा दिया।
दरबान की कुर्सी पास डॉगी को बिठाईं,
बोलीं, “मेरा टोकन आएगा,
तो इसे चुप-चुप-चुप कहना,
यह मुझे बुला लेगा।”
इस तरह अपने डॉगी को लगाया लाइन में,
खुद कार के ए.सी. में उपन्यास पढ़ती रहीं।
आश्चर्यजनक नया नज़ारा था,
कौन अस्वस्थ है, प्रश्न अनुत्तरित था।
-सीता गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
