नहीं उधारी भूलना,
यही धर्म का मूल।
मत तोड़ो विश्वास को,
शख़्स न जाना भूल।।
दान करें संसार को,
सिर पे रखे उधार।
ऐसे झूठे पुण्य से,
नहीं ख़ुशी करतार।।
मंदिर-मस्जिद घूमकर,
नहीं मिलेगा चैन।
क़र्ज़ उधारी रोंककर,
नींद ना आए नैन।।
वक्त बुरा जब था पड़ा,
जिससे मिला सहार।
उसका धन वापस करें,
यही धर्म संसार।।
ऋण लेकर जो भूलते,
उनका छोटा मान।
क़र्ज़ चुका कर जो जिएं,
ऊँचा उनका ज्ञान।।
पैसा केवल धन नहीं,
विश्वास भरोसा मान।
उसको लौटाना बने,
सच्चे मन की शान।।
दान-पुण्य से पूर्व ही,
कर लें यह उपकार।
मान दिया जिसने तुम्हें,
चुकता मान उतार।।
क़र्ज़ उधारी एक टक,
रखती मन पर बोझ।
ऋण चुका मुस्कान दे,
जीवन पाए ओज।।
विश्वासों के मोल को,
मत करना बेकार।
पहले ऋण उतरा करो,
फिर करना उपकार।।
जिसने दुख में थाम ली,
तेरे मन की डोर।
उसका पैसा रोकना,
पाप बड़ा घनघोर।।
माला,पूजा,पाठ सब,
बन जाते वरदान।
लौटाय उधारी दो अगर,
जाय मिलो सम्मान।।
वक्त बुरा था साथ में,
जिसने दिया सहार।
उसके प्रति कर्तव्य का,
मत करना इंकार।।
ऋण केवल धन का नहीं,
होता है विश्वास।
उसको जल्द चुकाइए,
यही धर्म है खास ।।
घर-घर दीपक बाँटते,
करते बड़े बखान।
जिसका पैसा रोकते,
कैसा फिर सम्मान।।
सच्चा मानव वह नहीं,
जो केवल धनवान।
सच्चा वह जो लौट दे,
हर रिश्ते का मान।।
-मान बहादुर सिंह ‘मान’
डभौरा, रीवा, (म.प्र.)
