ग्लेशियर टूटकर गिर रहे हैं, बड़ा हृदय विदारक मंजर है।
मलबा बह- बहकर आता है, पानी का प्रवाह भयंकर है।
स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए जाते थे कभी पहाड़ों पर,
प्रकृति का सौंदर्य निरखने को, पैदल जाते थे पहाड़ों पर।
अब रोज नए निर्माण हो रहे, होटल बढ़ते जाते हैं।
अवैध घुसपैठिए भी गुपचुप, आकर बसते ही जाते हैं।
सड़कें बनाई थीं इस कारण, वृद्धों को नहीं समस्या हो।
इतनी सुविधाओं के कारण सुविधा तो सारी ही गईं खो।
जिन मार्गो से बारिश के दिनों निर्बाध निकलता था पानी,
उन मार्गों पर निर्माण कार्य से निकल न पाता है पानी।
पानी जब निकल न पाता है, तो बहुत दबाव बनाता है,
सैलाब भयंकर आता है,सब
कुछ ही बहा ले जाता है।
धरती की सारी सुन्दरता, मानव ने नष्ट कर डाली है।
बाढ़ प्रयलंकर आई है,रो रहा चमन का माली है।
कितने अनमोल खजाने से, संसार सजाया था मैंने,
तू ऐसे नष्ट करेगा इसे, यह कभी न सोचा था मैंने।
तू कहता है विकास इसको, पर कैसा अजब विकास किया।
जो कुछ पहले से विकसित था, उसका भी आज विनाश किया।
केदारनाथ की त्रासदी से भी तुम कुछ सीख नहीं पाए,
ऋषि गंगा में आई तबाही से भी कुछ सीख नहीं पाए।
जोशीमठ भी दरक गया था, कितना कुछ बर्बाद हुआ।
तू इसको विकास कहता है, कैसा यह विकास हुआ?
पाई -पाई जोड़ा था जो, बाढ़ निगल कर चली गई।
लोगों की सारी खुशियों में, आग लगा कर चली गई।
सर पर छत भी नहीं रही, और खाने को भोजन भी नहीं।
कैसी यह विनाश लीला है, जो जन-जन को रुला रही।
-राधा गोयल
विकासपुरी (दिल्ली)
