ज़िन्दगी भर समझौतों की आग में झुलसकर भी,
औलाद के हृदय से निष्कासित पिता
राख के ढ़ेर में तब्दील हो जाता है !
निष्कासन की चिता में भस्म हो जाते हैं- रिश्ते, मर्यादा, अपनत्व,
यह हर किसी की ज़िन्दगी में घटने वाला घटनाक्रम नहीं है,अपितु ऐसे परिवारों में घटता है जहां औलाद की स्वतंत्रता के मानक अलग हैं और पिता की स्वतंत्रता के अलग,
जहां जवान पीढ़ी पिता को कठपुतली बनाकर इस्तेमाल करने लगती है! उसकी जिम्मेदारियों का उसके समर्पण का उसके स्नेह वात्सल्य का माखौल उड़ाया जाता है!
ता उम्र जिम्मेदारियों के बोझ तले अपने परिवार को अपनी दुनिया समझने वाले, अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए खून पसीना बहाकर दिन रात एक करने वाले,
बचपन में अपनी औलाद के खिलौनों के लिए खुद खिलौना बन जाने वाले,,,, सच में खिलौना ही तो बन जाते हैं,,,,,
आप सोचते हैं मैं ऐसा लिखूंगा कदाचित नहीं,,, मैं ऐसा कभी लिख ही नहीं सकता
औलाद की खुशी से बढ़कर और कोई खुशी होती है क्या?
परिवार के सुख से बड़ा और कोई सुख होता है क्या?
सामाजिक ताने-बाने से निकलकर कोई एकाकी जी पाया है क्या?
इन सबका उत्तर दे पाना कठिन है पर कुछ उत्तर बुद्ध और महावीर को गढ़ते हैं उन्हें भगवान बना देते हैं!
यह तो विषयांतर हो गया, बातें तो कुछ और ही चल रही थी एक पिता की,,,,
अपनी मर्ज़ी कुछ नहीं होती – ग़म के बाज़ार से वह अपने लिए कोई खुशी नहीं खरीद सकता
उसका अपना कोई स्वाद नही होता उसकी जिव्हा ग्रंथी औलाद के पेट से होकर गुजरती है
उसका अपना कोई परिक्षण नहीं होता परिवार की, तंदुरुस्ती ही उसका स्वास्थ्य प्रमाणपत्र है
दुनिया भर के पिताओं खूब कमाओ धन ऐश्वर्य कभी औलाद का प्यार कमाओ तो खुद को भगवान समझना
ऐसी औलाद जिनको पिता की जरूरतों को समझने का हुनर आता हो वो भी समतुल्य है
-दिनकर राव दिनकर
