नींद में जब कभी मुस्कुराने लगे।
और ख्वाबों में आकर सताने लगे।
मज़लिसों में हमें वो भुलाने लगे।
हम ग़ज़ल चाहतों की सुनाने लगे।।
यूं तो कोई नहीं उनको जंचता यहां।
क्यों मुझे देखकर मुस्कुराने लगे।।
बोझ कांधे पे उनके भी कुछ कम न था।
दास्तां ज़ख्म उनकी बताने लगे।।
ज़िंदगी रेत सी जब फिसलने लगी।
पांव मेरे सनम लड़खड़ाने लगे।।
कोई जादू तुम्हारी छुअन में तो है।
फूल गुलशन के भी मुस्कुराने लगे।।
मौत का फ़लसफ़ा तब समझ आ गया।
जब मुझे प्यार में आजमाने लगे।।
-प्रियंका झा
