वे बच्चे
जो खेतों की मेड़ों पर बैठकर
भूगोल नहीं,
भविष्य पढ़ते हैं…
जो लालटेन की लौ में
रसायन के सूत्र घोलते हैं,
जो भूख को पानी से भरकर
नींद को किताबों में टाल देते हैं,
आज वही बच्चे
सरकारी मुहरों के नीचे
अपना विश्वास दबा हुआ देख रहे हैं।
एक लड़का था…
गांव का…
जिसकी मां ने
पुरानी साड़ी बेचकर
फॉर्म भरवाया था,
जिसके पिता ने
मक्का के बोरे तौलते हुए
हर दाने में
एक सपना जोड़ा था।
वह लड़का
रात-रात भर
मोबाइल की टूटी स्क्रीन पर
यूट्यूब से डॉक्टर बनने का रास्ता खोजता रहा।
उसे क्या पता था
कि उसकी मेहनत से पहले
किसी दलाल की जेब
प्रश्नपत्र हल कर चुकी होगी।
परीक्षा केंद्र पर
उसका कलावा कटवा लिया गया,
जनेऊ उतरवा लिया गया,
जेबें टटोली गईं,
जूते खुलवाए गए,
यहां तक कि
उसकी मां की दुआओं तक को
संदेह की निगाह से देखा गया…
लेकिन
जो लोग
पूरे सिस्टम की जेब में
लीक का जहर रखे बैठे थे,
उनकी तलाशी
किसने ली?
किसी अफसर की कैंची ने
एक गरीब लड़के की पैंट काट दी,
शायद उसे मालूम नहीं था
कि गांव में
एक अच्छी पैंट
कभी-कभी
पूरे मौसम की फसल के बराबर होती है।
तुम कहते हो,
“फिर से परीक्षा होगी…”
पर क्या
फिर से लौट आएगा
उस बच्चे का टूटा हुआ भरोसा?
क्या फिर से जुड़ पाएंगी
वे रातें
जो उसने नींद गिरवी रखकर बिताई थीं?
पेपर केवल प्रश्न नहीं होते,
वे लाखों घरों की धड़कन होते हैं।
उनमें
किसी मां की सूखी हथेली का आशीर्वाद होता है,
किसी पिता की झुकी कमर का संघर्ष,
किसी बहन की अधूरी चूड़ियों का त्याग,
किसी भाई की
फटी चप्पलों में दौड़ती उम्मीदें होती हैं।
और जब पेपर लीक होता है,
तो केवल परीक्षा नहीं टूटती,
देश का नैतिक मेरुदंड दरकता है।
मेहनत हारती नहीं,
पर अपमानित जरूर होती है।
सरकारों!
यदि तुम सचमुच
सीमा की रक्षा करना चाहते हो
तो पहले
इन परीक्षा माफियाओं से देश बचाओ।
क्योंकि
जो बच्चों के सपने चुराते हैं,
वे किसी दुश्मन देश से कम नहीं होते।
एक दिन
यही गांव के बच्चे
फिर उठेंगे…
आंखों में आक्रोश लिए,
दिल में उम्मीद लिए।
वे फिर पढ़ेंगे,
फिर लड़ेंगे,
फिर जीतेंगे,
क्योंकि
भारत अभी भी
अपने गांवों की जिद पर टिका है।
लेकिन इतिहास
यह जरूर लिखेगा,
कि इस देश में
कुछ बच्चों ने
डॉक्टर बनने से पहले
व्यवस्था की बीमारी देख ली थी।
-मंजुल त्रिवेदी
