पत्र लेखन — स्वयं के मन के लिए

मेरे अन्तर्मन,

मैं जानती हूँ तुम बहुत अच्छे हो। तुम्हारे कारण ही तो मैं भी अच्छी कहलाती हूँ। हाँ, अच्छे बने रहने के लिए तुमको कष्ट भी देती हूँ और तुमसे समझौता भी करती हूँ।

दिल और दिमाग की लड़ाई तो सभी करते हैं। पर मुझे लगता है कि दिमाग के साथ तुम्हारी लड़ाई कुछ ज्यादा होती है। फिर भी क्या कम है कि तुम हमेशा मेरे दिमाग को हरा देते हो और अपने मन की कर लेते हो। दिमाग समझाता रहता है कि ज़माने के साथ चलो, जो जैसा करता है वैसा करो। पर तुम उसे संभाल लेते हो। अपनी मीठी बातों से समझा देते हो, “अगली बार ध्यान रखूँगा” कह देते हो आसानी से। यह तुम भी जानते हो और दिमाग भी जानता है कि करोगे तो तुम मनमानी ही।

फिर रोते फिरते हो कि सब तुमको बेवकूफ बनाते हैं, सब उपयोग करते हैं। पर क्या करूँ, तुम्हीं तो मुझे हराते हो, रुलाते हो।

मेरा और मेरे हमसफ़र का चालीस वर्षों का साथ है। हमसफ़र से सब अपने दिल की बात कर लेते हैं, परंतु तुम्हें तो मालूम है मेरा हमसफ़र ज़रा नादान है। वह हर बात नहीं समझता, या यों कहूँ कि मेरे दिल को नहीं समझता। सबसे पहले उसके लिए उसका अपना मन है, फिर बच्चे और अंत में मैं। मुझे अत्यंत ख़ुशी होती है कि वह बच्चों को महत्व देते हैं, लेकिन जब वह उनकी भी नहीं सुनते तो मेरा अन्तर्मन कुंठित हो जाता है। वह स्वभाव के बहुत अच्छे हैं, परंतु अपनी शर्तों के हिसाब से।

मेरे अन्तर्मन, मैं कई बार सोचती हूँ कि बस तुम्हारे मन का करूँगी, तुमसे अपने दिल की बात करूँगी। पर तुमसे भी नहीं कह पाती हूँ। कितनी बार सोचा है कि अपने मन के अनुसार काम करूँ, अपने सपने पूरे करूँ, अपने तन का ख्याल रखूँ। सभी कहते हैं योग करो, एक्सरसाइज करो, मॉर्निंग वॉक, ईवनिंग वॉक। परंतु सामने दिखता काम इजाज़त नहीं देता और मैं तुमको नाराज़ कर देती हूँ। फिर भी तुम इतने अच्छे हो कि मेरी हर गलती पर माफ़ करके मुझे संभाल लेते हो। मेरा कंधा थपथपाकर मुझे टूटने से बचा लेते हो।

वादा करती हूँ मेरे अन्तर्मन, अब मैं तुमसे अपने सारे सुख-दुख बताऊँगी और तुम्हारे लिए जीने की कोशिश करूँगी। एक स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का रहना जरूरी है, इसलिए मैं पहले तन को फिर मन को स्वस्थ रखूँगी।

अंत में यही कहूँगी, मुझे अब तक जैसे संभाला, मान-सम्मान दिलवाया, जैसे ससुराल और मायके के बीच खुशियों और सम्मान का पुल बनाया है, वैसे ही मुझे संभाले रखना। भरपूर मान-सम्मान दिलवाते रहना। इसके लिए मैं तुम्हारी आभारी हूँ। भविष्य में भी मुझे ऐसे ही संभालना।

मुझे मंजू नाम मेरे माता-पिता ने दिया था, जो मुझे अत्यंत प्रिय है। यह नाम ही तो तुम्हारी और मेरी पहचान है।

तुम्हारी, सिर्फ तुम्हारी , मेरे अन्तर्मन

-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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