लिखा है एक खत मैंने खुद के ही नाम,
सोच के गहरे विस्तार से निकल कर
भावनाओं की पतवार थामे
उम्मीदों के अथाह सागर के पार
निकलना है मुझे।
नियति से मिले आंसुओं को
कमजोरी नहीं अपनी ताकत बनाओ!
कहती है मेरी कलम मुझसे।
और आगे लिखती हूं, सुनो अंतर्मन!
क्या हुआ जो खुशियों की राह,
कुछ छोटी मिली,
दामन में सिमटी छोटी-छोटी खुशियां ही
एक दिन मुस्कुराएंगी होंठों पर
हंसी बन कर।
इस दिखावे, प्रदर्शन, की दुनिया से दूर,
अपने सपनों को साकार करो,
यथार्थ की धरती पर।
जागो मेरे दोस्त!!
अब विदा लेती हूं,
फिर मिलेंगे!!
तुम्हारा ही मन…..!
-पद्मा मिश्रा
जमशेदपुर
