“पहाड़ों पर सुकून है ये अब समझ में आया है,
यहां आकर जब मैंने खुद से खुद को पाया है।
कुछ मुश्किलों ने जकड़ा है कुछ बातों ने उलझाया है,
यहां आकर समझे कि बस साथ मेरा हमसाया है।
जो शोर था भीतर मेरे, वो इन बर्फीली चोटियों ने सुलाया है,
लगता है बरसों बाद आज, इस दिल ने खुलकर मुस्कुराया है।
न कोई बंदिश है यहाँ, न किसी ने खेल कोई रचाया है,
कुदरत की इस सादगी में खोकर, हर दर्द ही भुलाया है।
खोई रही जिस सुकून की तलाश में उम्र भर यूं मारी-मारी,
उसे मैंने आज इन खामोश रास्तों पर चलते हुए पाया है।
इन वादियों ने और इन ठंडी हवाओं ने एक ऐसा राग सुनाया है,
शहरों की बेमतलब दौड़ को जैसे नजरअंदाज कराया है।”
-डॉ मंजू तिवारी
