सागर की गहराई नभ की, ऊँचाई थे पापाजी
तुलसी के मानस की मीठी, चौपाई थे पापाजी।
पीपल की छाया थे ठंडी, शरद सूर्य की गरमाहट
आँसू की मुस्कानों से झट, भरपाई थे पापाजी।
अस्थाई था हर इक साहस, हर इक साथी सहबाला
पहले पल से अंतिम पल तक, स्थाई थे पापाजी।
मोह भरम ने हम बच्चों को, जब भी मोहा भरमाया
तब तब हमको गीता वाले, कन्हाई थे पापाजी।
सज्जन थे, मृदुभाषी थे, सूक्तियों को जीते थे
क्रोध अगर आ जाए तो फिर, दंगाई थे पापाजी ।
मम्मी के स्वर की ताकत थे, आदेशों की स्याही थे
उनके माथे की बिंदी की, गोलाई थे पापाजी।
कड़वे कड़वे लगे हमें वो, जब जब दर्पण दिखलाया
अब जाना है सच से सच्ची, सच्चाई थे पापाजी।
रहे शहर में भले आयु भर, रहे मगर वो मिट्टी के
तन से मन से जीवन से भी, कस्बाई थे पापाजी।
दो जोड़ी में जीवन काटा, जो भी पाया वो बाँटा
सच कहता हूँ सम्मुख जीवित, अच्छाई थे पापाजी।
चूल्हे चौके के पक्के थे, हाथों में जादू था ज्यों
हम बच्चों में स्वाद जगाते, हलवाई थे पापाजी।
अधरों पर रहते थे उनके, राजा रानी के किस्से
बच्चों की मांगों की पूरी, सुनवाई थे पापाज।
बच्चा जी कहते थे मुझको, सर सहला हाथों से वो
मुझको तो केवट की गंगा, उतराई थे पापाजी।
लगता है वो पास कहीं हैं, कैसे कह दूं आज नहीं
हर पल मेरे साथ रही वो, परछाई थे पापाजी।
-आलोकेश्वर चबडाल
