पिता आखिर तुम चले ही गए
हर बार की तरह इस बार भी
बिना कुछ कहे
तुम्हारे जाने के पदचाप सुनकर भी
मैं तुम्हें रोक नहीं पाई
बरसो का अबोला क्षण में तोड़ना
सम्भव न हुआ
शब्द बस कांप भर पाए
जब तुम पिता थे और
मैं थी नन्ही लाडो बिटिया
तुम मेरे संरक्षक भी थे
और आदर्श भी
शायद तुम इस तथ्य से
अनजान ही रहे कि
उम्र बढ़ने पर
हर बेटी ..हर बहन
स्त्री हो जाती है पिता
और जानते हो न
स्त्रियों के दुख परस्पर जुड़ जाते हैं
माँ की आँखों मे आँसू दे
तुम मुझसे मुस्कान नहीं पा सकते थे
माँ के पास होना
तुमसे दूर होना नहीं था
माँ के सम्मान की कामना
तुम्हारे अपमान का पर्याय भी न था
लेकिन तुमने कर लिया खुद को अकेला
हमारी पुकारों को कर दिया अनसुना
और मौन निभाते रहे जिम्मेदारियां
जीवन चलता रहा पिता
लेकिन उसमें सहजता की लावण्य न रहा
जो बीत सकता था सम्मिलित कहकहों में
उस पल मुस्कानों में भी साम्य न रहा
हम प्रतीक्षित रहे पत्थर में
कभी तो उगेंगे कोपल
किंतु हमारा स्नेह वह बरसात न कर पाया
तुम्हारे ताप के आगे सब बूंदे
पहले ही भाप बन तिरोहित होती गईं
अब बची हैं तो लपटों में तप
बस कुछ राख
इन बुझे अंगारो में
तुम्हारे स्नेह की नमी है
और पिता तुम जान लो
तुम हार गए हो
इस बार तुम अकेले
नहीं जा पाए
तुम्हारे साथ चले गए है
हमारे सारे अलगाव, मतभेद
और शायद उन से कहीं गहरे उग आए
मनभेद भी
दूर जाकर तुम पास आ गए हो पिता
अब फिर से कह सकती हूँ
तुमसे मन की सब बातें
टोक सकती हूँ तुम्हें
तुम्हारी गलतियों पर
गर्वित हो सकती हूं
तुम्हारी उपलब्धियों पर
अब तुम्हारे और मेरे बीच
माँ नहीं है
और न ही हैं
माँ के साथ किया
तुम्हारा रुखा व्यवहार
पर माँ जाने क्यों अब
दिन भर रोती है
क्या अब भी तुमसे
वह दिल की कुछ न कहती है?
-निधि अग्रवाल
