स्नेह
कैसे हो? तुम पक्का मुझे कोसते होगे। क्योंकि मैं सदैव तुम्हें बोझिल रखती हूं। और कुछ न कुछ उधेड़बुन में तुम्हें घेरे रखती हूं पर तुम तो जानते ही हो कि मेरा तुम्हारे अलावा कोई और मित्र नहीं। जब भी मैं खुश होती हूं तो और जब भी उदास होती हूं तब बस तुम्हीं से तो बातें करती हूं । और तुम्हीं मुझे सही राह दिखाते हो ।
आज मै फिर से बहुत उदास हूं आज मुझे अपनों से ही ऐसा दर्द मिला है जिसे न सह पा रही हूं न ही किसी के आगे बयां कर सकती हूं। इसीलिए मैं तुम्हे यह पत्र लिख रही हूं।
आशा करती हूं कि हर बार की तरह इस बार भी तुम मेरी बातों को धैर्यपूर्वक सुनोगे और सही मार्गदर्शन भी दोगे। ताकि में थोड़ा सुकून महसूस कर सकूं।
और बहुत सारी बातें होती रहेंगी तुमसे अभी बस इतना ही।
तुम्हारी प्रिय
-रीति झा
जमशेदपुर (झारखंड)
