तपती दोपहरों के माथे पर
जब समय अंगार लिखता है,
जब धूल भरे रास्तों पर
मनुष्य अपने ही भीतर सूखने लगता है,
तब कहीं दूर
कोई ‘Delonix regia’
धीरे-धीरे
आग पहनकर खिलता है।
लोग उसे
”गुलमोहर” कहते हैं
शायद इसलिए
कि वह फूलों का नहीं,
धधकते हुए मन का मोहरबंद मौसम है।
कोई उसे ‘कृष्णचूड़ा’ कहता है,
क्योंकि उसके भीतर
राधा की प्रतीक्षा भी है
और कृष्ण का विरह भी।
उसकी शाखाओं पर
सिर्फ फूल नहीं खिलते,
अनगिनत अधूरी बाँसुरियों की तानें
लाल होकर झूमती हैं।
किसी ने उसे ‘अग्निपुष्प’ कहा
और सच ही तो है,
इतनी तपिश के बाद भी
जो जलकर राख नहीं होता,
बल्कि और अधिक खिल उठता है,
वह फूल नहीं,
तप का चरम होता है।
वह ‘राधाचूड़ा’ भी है
प्रेम की वह अंतिम आभा,
जो मिलन से नहीं,
प्रतीक्षा से जन्म लेती है।
जैसे किसी स्त्री ने
अपने समर्पण को
फूलों में बदलकर
धरती पर टाँक दिया हो।
बच्चे उसे
‘मोरपंखी वृक्ष’ कहते हैं,
क्योंकि उसकी पत्तियों में
बारिश से पहले
मोर के पंखों जैसी हरियाली काँपती है।
और सचमुच,
जब हवा गुजरती है,
लगता है
धरती ने अपने दुखों पर
हरा आँचल रख दिया हो।
पर मेरे लिए
वह केवल वृक्ष नहीं,
एक सम्पूर्ण युग का प्रतिरोध है।
इसीलिए शायद
उसे ‘अग्निवृक्ष’ कहा गया।
क्योंकि वह सिखाता है
जलना विनाश नहीं होता,
यदि भीतर जीवन बचा हो।
कवियों ने उसे
‘ज्वालातरु’ कहा,
क्योंकि उसकी डालियों पर
ऋतुएँ दीपक बनकर जलती हैं।
साधकों ने कहा
यह ‘अग्निशिखा’ वृक्ष है,
जो तपती पृथ्वी की प्रार्थना को
आकाश तक पहुँचाता है।
और सच पूछो तो
गुलमोहर किसी वनस्पति का नाम नहीं,
वह मनुष्य की उस जिद का नाम है
जो सबसे कठिन समय में भी
रंग चुन लेती है।
वह
धरती की खुली हुई आग है,
धूप का उत्सव है,
थके हुए समय की लाल मुस्कान है।
जब सब पेड़
हरियाली बचाने में लगे रहते हैं,
तब गुलमोहर अपना पूरा हृदय फूलों में बदल देता है।
शायद इसलिए
वह सिर्फ देखा नहीं जाता,
महसूस किया जाता है।
-डॉ. प्रीति समकित सुराना
