“जिंदगी का फ़लसफ़ा भी अजीब होता है,
जो दूर लगता है वही अपने करीब होता है।
रिश्ते नाते निभाते हर कोई अजीज होता है,
वक्त गवाह है कि कौन कितना करीब होता है।
समझना आसान नहीं टूटे दिल को यूं ही,
जो ज़ख्म देता है, वही उसका तबीब होता है।
दिखावे की दुनिया में वफ़ा ढूँढता है ये दिल,
यहाँ हर चेहरे के पीछे नया रकीब होता है।
मगर शिकवा करें भी तो आखिर किससे करें हम,
मोहब्बत में मिलना और बिछड़ना तो नसीब होता है।
वक्त बदलता है और हर ज़ख्म भर ही जाता है,
जो आज तन्हा है,कल वही महफ़िल का हबीब होता है।”
(तबीब- हकीम ,रकीब- दुश्मन,हबीब- पसंदीदा)
-डॉ मंजू तिवारी
