बचपन के रंग सपनों के संग

बचपन फिर से वापस आ सकता नहीं
यह मैं जानती हूं फिर भी बच्चों के संग बच्चे बन जाने सपने देखती हूं। क्योंकि, मैं एक बार फिर से बच्चा बन जाना चाहती हूं।
कोमल मन निस्वार्थ भाव
निश्छलता भरी जीवन जीना चाहती हूं,
ना किसी से कोई भेद-भाव,
ना किसी से कोई द्वेष
अपने दिल में रखना चाहती हूं। क्योंकि मैं फिर से बच्चा बन जाना चाहती हूं।
खेलना चाहती हूं मिट्टी के खिलौनों से, गुड़ियों का फिर से ब्याह रचाना चाहती हूं ,
बनाकर मिट्टी का घरौंदा उसमें खाना पकाना चाहती हूं,
वो छुपम -छुपाई का खेल
और पकड़े जाने पर मुंह फुला लेना सचमुच बहुत याद आता है, छोटी-छोटी बातों के लिए जिद करना और फिर से रूठ जाना चाहती हूं। हां ,क्योंकि मैं फिर से बच्चा बन जाना चाहती हूं।
गर्मी की छुट्टियों में भाई-बहन, मम्मी- पापा के संग फिर से नानी के घर जाना चाहती हूं ,
वह आम के पेड़ पर झूला लगाकर झूलना चाहती हूं ,
दूर-दूर तक फैले हुए खेतों में लहराते अनाजों के बीच छुपकर सब को ढूंढने के लिए बुलाना चाहती हूं,
हां, मैं फिर से एक बार बच्चा बन जाना चाहती हूं।
दादाजी की छड़ी बनकर उनके साथ सैर पर जाना चाहती हूं ,
दादी की मीठी कहानी सुन कर फिर सो जाना चाहती हूं,
पापा की दुलारी बनकर
मम्मी से प्यार पाना चाहती हूं ,
हां, एक बार फिर से मैं बच्चा बन जाना चाहती हूं।
छोटा-सा बस्ता टाँग,
हर सुबह मुस्कुराते स्कूल जाना चाहती हूँ,
नई-नई पुस्तकों की भीनी-सी खुशबू में,
सपनों का अपना संसार सजाना चाहती हूँ।
कॉपी के पन्नों पर रंग-बिरंगे फूल बनाकर,
शिक्षक से शाबाशी पाना चाहती हूँ,
टिफिन की मीठी-सी खुशबू को
दोस्तों के संग मिल-बाँटकर खाना चाहती हूँ।
आधी छुट्टी की वह प्यारी-सी घंटी,
मैदान में खिलखिलाकर दौड़ जाना चाहती हूँ,
कंधों पर बस्ता, हाथों में किताबें लिए,
बचपन की उसी राह पर फिर लौट जाना चाहती हूँ।
हाँ, क्योंकि मैं फिर से बच्चा बन जाना चाहती हूँ।

-रीति झा

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