बड़ी ज़हमत उठाई जा रही है,
सरे महफ़िल सजाई जा रही है।
मैं बिकने को नहीं तैयार लेकिन,
मेरी क़ीमत लगाई जा रही है।
मैं निकला था यहाँ लेने खिलौने,
मुझे छूरी थमाई जा रही है।
नये इक मॉल की अब ओपनिंग है,
हर इक रेहड़ी हटाई जा रही है।
नहीं बच्चों ने सीखी राइम अब तक,
मगर गाली सिखाई जा रही है।
जो समझेगी महज़ नफ़रत की भाषा,
वहीं दुनिया बनाई जा रही है।
मेरे बेटे को मैं कैसे बताऊं,
कि क्यूँ बेटी बचाई जा रही है।
ज़रा दाने का लालच डाल कर अब,
कहीं बुलबुल फँसाई जा रही है।
ये माला देख कर धोखे में मत पड़,
तेरी अर्थी सज़ाई जा रही है।
-सुमित अग्रवाल
