बड़े भाग्य

“बड़े भाग्य यह मानुष तन पाया |
सुर दुर्लभ सद्ग्रंथन्हि गाया ||”

धनकुबेर आतुर हैं सारे,
पञ्चतत्व कब्जाने को।
कलि की यह राक्षसी सोच,
मानव मानव को खाने को।।

नहीं रहा है, नहीं रहेगा,
सदा-सदा कोई अस्तित्व।
हर जन्मे की मृत्यु सुनिश्चित,
मृत्यु से बड़ा न कोई व्यक्तित्व।।

व्यक्ति नहीं है सृष्टि-रचयिता,
यह पराशक्ति है कोई और।
आदि-अनादि ईश्वरी तत्त्व है,
हम सभी बँधे हैं उसी की डोर।।

बड़े भाग्य यह मानुष तन पाया,
सुर-दुर्लभ सद्ग्रंथन्हि गाया।
जब तक साँसें हैं तन भीतर,
फैलाओ मानवता की छाया।।

-नील मणि पाण्डेय

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee

0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x