“बड़े भाग्य यह मानुष तन पाया |
सुर दुर्लभ सद्ग्रंथन्हि गाया ||”
धनकुबेर आतुर हैं सारे,
पञ्चतत्व कब्जाने को।
कलि की यह राक्षसी सोच,
मानव मानव को खाने को।।
नहीं रहा है, नहीं रहेगा,
सदा-सदा कोई अस्तित्व।
हर जन्मे की मृत्यु सुनिश्चित,
मृत्यु से बड़ा न कोई व्यक्तित्व।।
व्यक्ति नहीं है सृष्टि-रचयिता,
यह पराशक्ति है कोई और।
आदि-अनादि ईश्वरी तत्त्व है,
हम सभी बँधे हैं उसी की डोर।।
बड़े भाग्य यह मानुष तन पाया,
सुर-दुर्लभ सद्ग्रंथन्हि गाया।
जब तक साँसें हैं तन भीतर,
फैलाओ मानवता की छाया।।
-नील मणि पाण्डेय
