बसंत

सुनो,
फूलों के मौसम में
पतझर में,
झरते
पत्तों के बाद,
पलाश, चमेली,
चंम्पा खिल उठते हैं,…।
हवाओ में महकती है
उनकी खुशबु, हौले हौले
सहलाती है हवा मेरें मन को,
दवा बन,
खुशबूओं से भर जाता है,
अन्तस का हर एक कोना,
तुम्हारी!
खुशबू की पायल पहन
मैं हो जाती हूँ बसन्त,…।

-बबिता कंसल

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