सूख जाए जब सुख की डाली
छलक उठे जब दुःख की प्याली
बुझी बुझी सी हो सारी बातें
कटे न जब अंँधियारी रातें
जब कांँटे भरे हो दामन में
जब बरसे मेह न सावन में
जब संग में विषधर पलते हों
अपनों को अपने छलते हों
मनुज जब डर कर जीता हो
रावण के चंगुल में सीता हो
जब बल-वरण कोई करता हो
चीर हरण कोई करता हो
नव प्रस्तर तब धरना होगा
नाश पाप का करना होगा
सच के लिए अब अड़ना होगा
हक की खातिर लड़ना होगा
लोह शस्त्र सा गलना होगा
भूल कर पीड़ा चलना होगा
सच्चाई का बोध तुम लेना
अन्याय का प्रतिशोध तुम लेना
जब अमृत यह गरल होगा
जीवन ये तभी सरल होगा
-सन्जू श्रृंगी
कोटा (राजस्थान)
