‘बाबू, ओ साहिब’

ओ बाबू,ओ साहिब,ओ मेम साहिब
हमे इंतजार है सवारियों का
क्या आपको कहीं जाना है
तो इधर आइये ना
कुछ पैसों के लिये
ले चलेंगे हम आपको
जहाँ भी है आपको जाना l

मेरा बापू घर पर बैठा रहता है बेकार
दिनभर फूँकता है बीड़ी
माँ कराहती है बीमारी से
भाई-बहन सभी
मुझ पर हैं निर्भर
दवा के बिना, कभी अन्न के बिना
हम सो जाते हैं कभी
भूखे पेट मसोस कर
मेरे ही कंधों पर टिका
हुआ है सारा घर l

जिंदगी किसी तरह
घिसट रही है और
हमारी उम्मीदों का सूरज
हर सुबह उगता है, पर
हर शाम संग डूब जाता है
हम दो बख्त रोटी के लिये
ही तो मुस्कुराते हैं
इन रोटियों से जिंदगी का
कितना अजीब नाता है l

बसंत-बहार आती है पर
हमारी जिंदगी में तो
आँधी, शीत और पतझर
हमेशा ही बने रहते हैं
पसीना टपकता है माथे से
नंगे पैरों, हाँफते हुये
मेहनत-मजदूरी करके
सबकी सुनते और सहते हैं l

दहकते हुये सूरज के नीचे
तपती दुपहरी और आँधी में
झम-झम बरसते पानी में
हम तरबतर भीगते हैं
अधढँके गात लिये और
अरमानों की सौगात लिये
हम पेट की खातिर ही तो
सारा दिन बोझ खींचते हैं l

ओ बाबू,ओ साहिब,ओ मेम साहिब।

-शन्नो अग्रवाल

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