नहीं रहा
वो बचपन
वो खेत-खलिहान,
बीत गया वो कल
वो बारिश
वो गीला मैदान.
जहाँ फिसलकर
माटी-चन्दन से हम
बाबा भोले बन जाते थे,
देख हम बच्चों की टोली
सभी बड़े मुस्काते थे,
जब माटी की
सौंधी गन्ध
नथूनों में समाती थी,
तब रसोई में
गीत गा-गाकर माँ
भजिये खूब बनाती थी,
भजिये से जब
भरते थे पेट
रोटियाँ कुड़मुड़ाती थी,
टीन-टप्पर पर
बारीश की बूँदे
राग मल्हार सजाती थी,
बिजली गुल
घुप्प अंधेरा
टप्पलम-टाई लगाते थे,
लगती चोट
सिर में तो
जोsssर से हम
चिल्लाते थे,
वो माटी की सौंधी गंध
पूरी रात हमें
जगाती थी,
महक भरे जीवन के
नव स्वप्न
वह नित सजाती थी,
सज गए सपने
साकार हुए भी,
शहर जाकर भटक गए
दो जून रोटी की खातिर
कंक्रीट वन में
अटक गए,
सुहावना
आज का परिदृश्य भी है,
लेकिन
न माटी न गंध है,
अब चौबारे पर
टोली नहीं सजती
बसssssss,
दो टूक सम्बन्ध है।
-प्रदीप कुमार अरोरा
पुणे
