बाल श्रमिक

हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के..

   कभी ये पंक्तियां हमारी रग-रग में दौड़ा करती थीं। फिर देश आजाद हुआ और अंग्रेज चले गये। पीछे छोड़ गये अपनी कुछ अच्छी-बुरी आदतें और कुछ अंग्रेजियत! 

   उन्हीं में से एक थी बाल-श्रमिक।

अपनी सुविधा के लिए अंग्रेजों ने हमारे बच्चों को भी नहीं छोड़ा और उनसे भी गुलामी कराया करते थे! स्वतंत्र होने के बाद हमने भी ये बीमारी अपनाए रखी और हम अपने देश से बाल श्रम नहीं हटा पाए!!हाय! कैसी विडम्बना है ये!

   आज तमाम सरकारी कानूनों के बाद भी ये काम यत्र-तत्र-सर्वत्र चालू है! पत्थर खदानें, माचिस फैक्ट्रियों, कुछ हस्तशिल्प कारखानों आदि में तो बहुत बुरा हाल है! बच्चे अपनी मासूमियत और लड़कपन भूल कर कब धीरे-धीरे अपराधों की दुनिया में कदम रख लेते हैं पता ही नहीं चलता!!

   हर परिस्थिति में हमें बाल श्रमिकों को तथाकथित ठेकेदारों और सप्लायरों के चुंगल से छुड़ा कर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ते हुए उनके मूलभूत अधिकार व सुविधाएं मुहैया करानी ही होगी। 

   इन नौनिहालों को इनका बचपन, इनका पढ़ाई का अधिकार, इनके खेलकूद की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए इन्हें एक मुक्त आकाश विचरण हेतु उपलब्ध कराना होगा। तभी हम देश से बाल श्रम की बुराई को मिटा सकते हैं।

-सुषमा अग्रवाल
नागपुर (महाराष्ट्र)

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee

0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x