मुझे कभी-कभी लगता है कि हम स्त्रियां खुद को प्रूव करने के चक्कर में कुछ ज्यादा ही गंभीर हो जाती हैं
हमें हर समय कुछ बनना है। अच्छी बेटी बनना है, सफल स्त्री बनना है, समझदार पत्नी बनना है, संवेदनशील माँ बनना है, आध्यात्मिक बनना है, संतुलित बनना है। और अगर इनमें से कुछ भी नहीं बन पा रही हैं तो कम-से-कम ऐसा दिखना है कि हम उस दिशा में बढ़ रही हैं।
मुझे याद नहीं कि बचपन में मैंने कभी सोचा हो कि मैं कौन हूँ। मेरे क्या लक्ष्य हैं, मैं क्या करूँगी या मैं क्या बनूँगी।
मैं बस थी। कभी मिट्टी में खेल रही थी, कभी बिना वजह रो पड़ती थी, कभी किसी सहेली से लड़कर अगले ही घंटे उसके घर बैठी हँस रही होती थी। उस समय मुझे अपने व्यक्तित्व को लेकर कोई चिंता नहीं थी।
मगर अब है। अब कई बार कोई बात कहने से पहले सोचती हूँ कि इससे मेरे बारे में क्या पता चलेगा.. कोई मेरे बारे में क्या सोचेगा। कोई निर्णय लेने से पहले सोचती हूँ कि लोग मुझे कैसे देखेंगे।
यहाँ तक कि दुःख में भी मन का एक हिस्सा बैठा रहता है जो दुःख नहीं जी रहा होता बल्कि उसे देख रहा होता है कि मैं दुःखी कैसी दिख रही हूँ। शायद यही वजह है कि बड़े होने के साथ सहजता कम होती जाती है।
हम जीवन कम जीती हैं और ये सब बाते ज़्यादा सोचती हैं।
कभी-कभी किसी बूढ़ी औरत को घर की देहरी पर धूप सेंकते देखती हूँ तो ईर्ष्या होती है।
वह किसी दौड़ में नहीं है। उसे कुछ भी साबित नहीं करना है अपने बारे में कि वह कैसी है ….समझदार है या विशेष है।
वह बस बैठी है। धूप का आनंद लेते हुए, धूप उसके चेहरे पर पड़ रही है और वह उसे स्वीकार कर रही है। कोई फर्क नहीं पड़ता उसे कि रंग काला हो जाएगा या आंखों के नीचे गड्ढे पड़ जाएंगे।
मुझे नहीं पता कि जीवन का उद्देश्य क्या है।
लेकिन इतना जरूर लगता है कि अगर जीवन के अंत में मैं फिर से उतनी ही सहज हो जाऊँ जितनी बचपन में थी, तो शायद उसे असफल जीवन नहीं कहा जाएगा।
बाकी जो कुछ है, वह शायद बीच का शोर है।
-मालिनी गौतम
