“१६- ११ मात्रा”
कल की चिंता छोड़ो बंदे, कल का कौन सहाय।
वर्तमान ही तेरा सब कुछ, जीवन सार उपाय।।
जीना जी बेफिक्र हमेशा,मौला मस्त कबीर।
भूत- भविष्य पूर्व निर्धारित, यह जग मात्र सराय।।
नित काहे को चिंता करता, चिंतन धार नवीन।
बेफिक्री की धुन में चल मन, पड़ा अकेला दीन।।
साँसों का आना फिर जाना, मरघट सत्य यथार्थ।
जन्म मिला है कर्म निभाते, हो जा तू लवलीन।।
चिंता सदा तो चिता समान, जीते जी अभिशाप।
सत्य वचन यह धारण कर ले, दूर रहे संताप।।
अच्छे कर्मों के फल सारे, संचित है पूर्वार्ध।
शरण- चरण में रह प्रभुवर के,लगा ध्यान शुभ जाप।।
-अमिता रवि दुबे
