बेफिक्र सा मेरा बचपन,
छोटी छोटी बातों पर
आल्हादित होता मन ।
कल क्या हुआ, क्या होगा कल
उलझी गुत्थियाँ ,सुलझेंगी कैसे?
क्या? होगा सवालों का हल,
सोचने समझने में ,
न लगाते थे हम अक्ल ,
रूठ जाते बात बात में
झूठे आँसू दिखा कर
जिद मनवाने में,
हो जाते थे सफल ,
वो दौर ही अलग था जीवन का
छोटी बातों पर होती बड़ी लडाई
बचाने खुद को कितनी कसमें खाई
माँ के आँचल की फूँक में था,
बड़ा जादू।
खुशियों का जादुई पिटारा थे मेरे दादू।
बूआ हमारे हर नखरे उठाती
दादी ज्ञान वर्धक कहानी सुनाती
धीरे-धीरे सब बड़े हो गए
पढ़ लिख अपने पैरों पर खड़े हो गए
घिर गए हैं अब दुनियादारी में
ढूँढते सुकून अब उधारी में
जुटे हुए हैं अब संवारने बच्चो का बचपन ,
कोशिश है न महसूस हो उन्हें अकेला पन,
थक जाता हूँ भाग दौड़ भरे दिन से जब,
सोचता हूँ
मिल जाती है आज भी जब गोद माँ की
भूल जाता हूँ चिंता फिकर जिंदगी की सारी।
बना रहे बच्चों पर माता पिता का साया ।
युग बदले पर नहीं बदली सुकून भरी उनकी छाया।
-स्मृति गुप्ता
जबलपुर
