अनभिज्ञ मैं जीवन की इस द्यूतक्रीड़ा से ,
अनंत गगन को नापती मैं अपने पंखों से ।
लक्ष्य पर साधती कितने निशाने अचूक से ।।
सहसा रुकी,आह!किसने बाँधा ये पाश से,
रिश्तों की फेंकी जंजीर मिलती काले नाग से।
लक्ष्य विहीन हुयी काल के किये आघात से ।।
पंखों को भी काटा गया स्वर्ण की कर्तनी से,
पत्रपाली से कटे पंख लिये लिपटे हम धूल से।
कट के भी ज्यों जकड़े रहे बेबसी की बेड़ियों से ।।
यह यादें भी कदाचित् मिलती हैं विषधर से ‘
बरसाती ये हलाहल साथी,स्निग्ध अधरन से ।
जलते तृण का ताप तीक्ष्ण लगता है ज्यों दिनकर से ।।
क्या? मैं माँग सकती थी याचना कर काल से’
पथ के पाषाण को तिनका करो रघुनाथ से ।
विहसती हस्त की रेखाएँ…नहीं! कहती बड़े अभिमान से ।।
-मैत्रेयी त्रिपाठी ‘मुग्धा ‘
