बेशक फुटपाथी हैं साहब,
मुल्क की हम थाती हैं साहब
शहर लदा है पीठ पे जिसकी,
हम वो देहाती हैं साहब
बाज़ू हैं हम मज़दूरों के,
दहकां की छाती हैं साहब
अपने लहू से जो रौशन है,
दीप की वो बाती हैं साहब
मर मिटते हैं आन की ख़ातिर,
थोड़े जज़्बाती हैं साहब
इज्ज़तदारों की निगाह में,
उज्बक उत्पाती हैं साहब
दुख अपना है बहुत कीमती,
खुशियां ख़ैराती हैं साहब
जिसे न पढ़ना चाहे कोई,
पीर की वो पाती हैं साहब
लड़ते हैं जो ज़ोर- ज़ुल्म से,
हम उनके साथी हैं साहब
बिन दूल्हे वाली बरात के,
औघड़ बाराती हैं साहब
चूहों से डर जाएं, असंभव,
पस्त हैं, पर हाथी हैं साहब
अपना ग़ज़ल से नाता यही है,
मीर के हम नाती हैं साहब
-राकेश शर्मा
