सृष्टि का आधार वही,
करुणा का दिव्य विस्तार है,
भारतीय नारी के आँचल में
सिमटा पूरा संसार है।
त्याग, तपस्या, प्रेम, समर्पण—
जिसकी अमर कहानी है,
भारत की पावन धरती की
वह गौरवमयी निशानी है।
गार्गी-मैत्रेयी बन जिसने
ज्ञान-ज्योति फैलायी थी,
सती अनुसूया बन त्रिभुवन को
ममता की राह दिखायी थी।
सीता की निर्मल मर्यादा बन
जो जीवन-पथ दर्शाती है,
मीरा की निष्कलुष भक्ति बन
हर हृदय में बस जाती है।
माँ यशोदा की वात्सल्य-छाया
जिसमें कान्हा पलते हैं,
माँ जीजाबाई के संस्कारों से
शिवबा जैसे वीर निकलते हैं।
मदालसा की अमृत वाणी
जिसने वैराग्य सिखलाया था,
माँ पन्नाधाय के बलिदान ने
राष्ट्र-धर्म निभाया था।
अहिल्याबाई की न्याय-दीपिका
जिसने इतिहास सँवारा था,
रानी दुर्गावती के साहस ने
शत्रु-दर्प को हारा था।
झाँसी की रानी बन रण में
जो ज्वाला-सी दहकाती है,
वही सत्यव्रता सावित्री बन
यम से भी जीत कर आती है।
माँ शबरी की निष्कलुष श्रद्धा
राम-नाम में खो जाती है,
माता अन्नपूर्णा बन नारी
हर घर में सुख बरसाती है।
कभी बहन बन राखी बाँधे,
कभी बेटी बन मुस्काती है,
कभी अर्धांगिनी बन जीवन की
हर पीड़ा संग सह जाती है।
माथे की बिंदिया में जैसे
पूर्णिमा का चंद्र दमकता है,
चूड़ियों की मधुर खनक में
संस्कृति का स्वर झलकता है।
रीति-रिवाज और पर्व-परंपरा
उससे ही जीवंत हुए,
नारी के पावन चरण जहाँ पड़े,
वहाँ सौभाग्य-वसंत खिले।
संस्कारों की अमिट धरोहर,
संस्कृति का वह दर्पण है,
नमन उस भारतीय नारी को
जिसका जीवन राष्ट्र समर्पण है।
-डॉ संगीता बिंदल
