भावनाओं का क्या, भावनाएं शब्दों की मोहताज नहीं होती
दूसरों को कद्र कर चलने से जिन्दगी कभी बेकार नहीं रहती।।।
इंसानियत में रहकर जो जीता रहता वही आदमी कहलाता है।
औरों की भावनाओं को आहत करता कहाँ वो आदमी लगता है।।
शब्दों के तीखे बाण से कब तक किसी को कोई हरा सकता ?
सज्जन किसी को उसके स्थायी ठिकाने से भी कहीं भगा सकता??
संयमित जीवन जिनका, उनकी अलग ही अभिलाषा रहती है।
मूर्खो से दूरियाँ बनाकर एकांत में जीना ये परिभाषा रहती है।।
दूसरों को आहत करने से भला है सबके ही हितों का सोचे आदमी।
समझें तो इस धरती पर सबसे सुंदर और बुद्धिमान जीव है आदमी।।
-अजय पाण्डेय बेबस
