हर वक्त भावनाओं को शब्दों की जरूरत नहीं होती ,
आँखो की नमी, मुस्कुराहट की कमी हकीक़त बयां करती ।
कभी झुके हुए काँधो, लडखडाये कदमों को किसी के ,हाथ थामने से संबल मिलता
कोई पोछें जो, गीली कोरों को तो चेहरा खिलता ।
दो पल के लिए ही सही, तिनके पर चमकी शबनम की बूँदे ,मोती लगती
फेरे जो दुलार भरा हाथ ,सिर पर तो दर्द मिटता दवा सी लगती ,
गले मिलते जब दो खफा लोग गलत फहमियाँ मिटती,
निगाहों निगाहों में होती बातें प्रीत परवान चढ़ती।
बिना कहे सुने जो समझे, दिल की बातें दूरियाँ घटती।
जोड़ -घटाना, रूठने -मनाने के लिए
खामोशी रस्ता ढूँढती ,
इसलिए तो कहते हैं ,भावनाओं को, शब्दों की जरूरत नहीं होती ।
-स्मृति गुप्ता
जबलपुर
