मजदूर आज भी मजबूर

मजदूर दिवस पर विशेष

मजदूर दिवस पर अवकाश व बधाई
परंपरा का हो रहा हर साल खूब निर्वाह
पर आज भी मजदूर असहाय, मजबूर
खून – पसीने की नहीं रहा कोई सम्मान
दुनियां के मजदूरों की हालत देखी नहीं
पर देश के मजदूरों की पीड़ा भोगा जरूर
सम्मान कम, दुत्कार मिलता ज्यादा
छोटी हो या बड़ी कंपनी सबका हाल बेहाल
शोषण के रास्तें अनेक,बहानें अलग-अलग
काम का दाम नहीं , न ही मिलता सम्मान
स्थायी काम भी कर रहे अस्थायी कामगार
कई स्थायी के इंतजार में हो जाते रिटायर
मजदूरों की पीड़ा देखने वाला कोई नहीं
उत्पादन बढ़ रहे, घट रहे नित्य मजदूर
ठेका संस्कृति का हो रहा विस्तार
दलाल संस्कृति के आगे मजदूर असहाय
काम के दबाव से चेहरे की चमक गायब
मजदूर नेता बन गये हैं मालिकों के पालतू
मजदूरों का हक मार चाभ रहे वे मलाई
खट – खट कर मजदूर तोड़ रहे दम
औद्योगिक घरानों के अपने कानून
सरकार, नेता सेवक की भूमिका में
शोषण के बीच हो रहा परंपरा का निर्वाह
मजदूर कुहुक – कुहुक कर मना रहे जश्न
जश्न के बीच खो रहा ‘मजदूर दिवस’ अर्थ
क्या ऐसे होती रहेगी परंपरा का निर्वाह
शोषितों की पीड़ा मांग रहा हर से जवाब
ऐसे ‘मई दिवस’ के लिये लगा था दहाड़ ?
जश्न के लिये मजदूरों ने दी थी कुरबानी
सवाल कर रहा परेशान, मांग रहा जवाब।

                                              -राजेश देशप्रेमी

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