सहेजकर हृदय की प्रीति
एक पेड़ के तने पर
तुमने उकेरी थी
दिल की कृति।
दिल के दिल में
हम दोनों का नाम लिखा था
रिश्ता एक बेनाम लिखा था
वो नाम नहीं जां थी दोनों की
मोहब्बत का पैगाम लिखा था।
मैं सच्ची थी तुम सच्चे थे
छल से परे सच्चा था प्रेम हमारा
पवित्र प्रेम को मिलता है
ईश्वर का करुण सहारा।
जब भी प्रेम करेंगे दो दिल
आएंगी उनके जीवन में मुश्किल
बढ़ेंगे कदम चलेंगी इधर राहें
मांगेंगी दुआएं ग़मगीन निगाहें।
सदियों तक हम याद रहेंगे
वो पेड़ अमर कर दिया है तुमने
प्रेम का गवाह बनाकर
मन्नत का रूप दिया है तुमने।
-आरती शर्मा
