“माँ, तुम कहाँ हो?” सपने के बाद सुनयना नींद से हड़बड़ा उठी.
“मैं तुम्हारे पास ही तो हूँ!” माँ ने कहा.
“पर मुझे तो दिखाई नहीं दे रहीं!” सुनयना सोच रही थी.
“दिखाई दे या न दे, माँ तो हमेशा पास ही रहती है, कभी साक्षात तो कभी एहसास बनकर!”
“एहसास!” सुनयना चकित थी!
“कल जब तुम आटे का हलवा बनाने लगीं, तुमने पहले ही मन में सोचा था कि माँ जैसा बने तो बहुत अच्छा!”
“यह बात तो सही है!”
“फिर जब तुम्हारे बने हलवे की पहली बार आए मेहमानों ने बहुत तारीफ करके पूछा कि हलवा किससे बनवाया है? तो तुमने कहा था- “मेरे पास माँ है…!” वो एहसास ही तो था!”
“पास न रहकर भी माँ का यह एहसास ही तो माँ का अस्तित्व और आशीर्वाद है! माँ कहीं जाती नहीं!” उसकी सोच जारी थी.
तभी कॉलबेल की आवाज से सुनयना की तंद्रा भंग हो गई।
-लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
